जब बांग्लादेश ने भारत को विश्वकप से बाहर कर दिया था

Asiaville

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Author 2019-09-17 15:47:33

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विश्वकप में बांग्लादेश ने भारत को सिर्फ़ एक मैच में परास्त किया है, लेकिन वो मैच इतना निर्णायक था कि एक हार ने भारत को पूरे विश्वकप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. भारत और बांग्लादेश विश्वकप में पहली बार एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खेल रहे थे. बात है 2007 की. उस बार वर्ल्ड कप के कई नियमों में बदलाव हुए थे. पहली बार सुपर सिक्स के बदले सुपर-8 का नियम बनाया गया था. 16 टीमों को चार अलग-अलग समूहों में रखा गया था. टीम इंडिया ग्रुप-बी में थी. साथ में थे श्रीलंका, बरमूडा और बांग्लादेश. ग्रुप लेवल पर हर टीम को 3-3 मैच खेलने थे. सुपर-8 में पहुंचने के लिए 2 मैच जीतने ज़रूरी थे.

ग्रुप-बी का पहला मैच हुआ श्रीलंका और बरमूडा के बीच. उस वक़्त श्रीलंका बेहद ख़तरनाक फॉर्म में थी. ख़ासकर सनथ जयसूर्या, महेला जयवर्धने और कुमार संगकारा के बल्लों से रनों की बरसात हो रही थी. श्रीलंका ने पहला मैच 243 रनों से जीत लिया. भारत को उसी वक़्त अंदाज़ा हो गया था कि उसे सारा ज़ोर बांग्लादेश और बरमूडा पर लगाना होगा. श्रीलंका के साथ मुक़ाबला बहुत मुश्किल होने वाला था.

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17 मार्च 2007 को इस ग्रुप का दूसरा मैच हुआ भारत और बांग्लादेश के बीच. मैच में भारत की कप्तानी राहुल द्रविड़ कर रहे थे. सौरभ गांगुली, द्रविड़, तेंदुलकर, सहवाग, युवराज और धोनी जैसे बल्लेबाज़ टीम में थे. लग रहा था कि मुक़ाबला आसानी से भारत जीत लेगा. टॉस भी भारत के पक्ष में रहा. टीम ने बल्लेबाज़ी का फ़ैसला किया.

लेकिन, तीसरी ओवर की पहली ही गेंद पर वीरेन्द्र सहवाग मात्र 2 रन बनाकर मशरफ़े मुर्तज़ा की गेंद पर बोल्ड हो गए. 6 रनों के स्कोर पर पहला झटका लगा. मुर्तज़ा उस वक़्त टीम के कप्तान नहीं थे. हबीबुल बशर ये ज़िम्मेदारी निभा रहे थे. सलामी बल्लेबाज़ सौरभ गांगुली उस दिन अच्छी लय में दिख रहे थे. सहवाग के बाद क्रीज़ पर उतरे रॉबिन उथप्पा. मुर्तज़ा ने फिर से भारत को झटका दिया. उथप्पा 17 गेंदों में मात्र 9 रन बनाकर आउट हुए. फिर सचिन तेंदुलकर 7, राहुल द्रविड़ 14, महेन्द्र सिंह धोनी शून्य, हरभजन सिंह शून्य और अजीत अगरकर शून्य पर आउट होते चले गए.

जूझते रहे सिर्फ़ सौरभ गांगुली और युवराज सिंह. युवराज सिंह अच्छी बल्लेबाज़ी कर रहे थे, लेकिन अर्धशतक से तीन रन दूर वो भी आउट हो गए. 157 पर टीम को पांचवां झटका लगा. उसके बाद गांगुली भी टिक नहीं पाए. छठे विकेट के तौर पर आउट होने से पहले गांगुली ने 129 गेंदों में 66 रनों की जुझारू पारी खेली. 158 पर छठा विकेट गिरा.

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इसके बाद विकेटों की झड़ी लग गई. थोड़ी ही देर बाद टीम 158/6 से 159/9 तक पहुंच गई. वो तो शुक्र है कि 10वें और 11वें नंबर के बल्लेबाज़ ज़हीर ख़ान और मुनफ पटेल ने 15-15 रनों की तेज़तर्रार पारी खेली और टीम का स्कोर खींचकर 191 तक पहुंचा दिया. टीम 50 ओवर खेले बग़ैर ऑल आउट हो गई थी. पोर्ट ऑफ़ स्पेन के मैदान पर उस दिन लग रहा था कि भारतीय गेंदबाज़ भी इसी तरह का कमाल दिखाएंगे. लेकिन, उस वक़्त में बेहद कमज़ोर माने जाने वाली बांग्लादेश ने भारत की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया. सलामी बल्लेबाज़ तमीम इक़बाल ने 51, शाकिब अल-हसन ने 53 और मुश्फ़िक़ुर रहीम ने 56 रनों की नाबाद पारी खेलकर मैच भारत के हाथों से छीन लिया. बांग्लादेश को उस मैच में 5 विकेटों से जीत हासिल हुई.

चार विकेट चटकाने वाले मशरफ़े मुर्तज़ा मैन ऑफ़ द मैच चुने गए. दिलचस्प ये है कि जो खिलाड़ी उस वक़्त भारतीय टीम में थे, उनमें से सिर्फ़ महेंन्द्र सिंह धोनी इस विश्वकप में खेल रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश की तरफ़ से मैच के जो चार हीरो थे, वो चारों इस विश्वकप में भी टीम के स्तंभ बने हुए हैं. मैन ऑफ़ द मैच मशरफ़े मुर्तज़ा इस वक़्त टीम के कप्तान हैं. शाकिब अल-हसन इस विश्वकप के सबसे सफल ऑलराउंडर हैं. वो 6 मैचों में 476 रन बनाने के साथ-साथ 10 विकेट चटका चुके हैं. मुश्फ़िक़ुर रहीम 327 रन बना चुके हैं. तमीम इक़बाल ने पिछले दो मैचों में अच्छी पारियां खेली हैं.

यानी 2007 के मैच में बांग्लादेश की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले सभी खिलाड़ी इस वक़्त बांग्लादेश के लिए दिग्गज़ बन चुके हैं. भारत आज तक उस हार को भुला नहीं पाया है. बांग्लादेश से पहला मैच हारने के बाद भारत के लिए अब बरमूडा और श्रीलंका को हराना ज़रूरी हो गया था. अगर भारत दोनों को मैच नहीं हरा पाता तो बरमूडा को बांग्लादेश को हराना पड़ता, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

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बांग्लादेश से हारने के बाद किरकिरी झेल रही भारतीय टीम ने सारा ग़ुस्सा बरमूडा पर उतार दिया और स्कोरबोर्ड पर 413 रन टांग दिए. सहवाग ने शानदार शतक जड़ा. युवराज ने 46 गेंदों में 83 और तेंदुलकर ने 29 गेंदों में 57 रनों की ताबड़तोड़ पारियां खेली. भारत ने मैच 257 रनों से जीत लिया. अब सामने थी बेहतरीन फॉर्म में चल रही श्रीलंका. भारत के लिए ये मुक़ाबला आसान नहीं था. लेकिन, ज़हीर ख़ान, अजीत अगरकर और सचिन तेंदुलकर ने उस दिन अच्छी गेंदबाज़ी की. श्रीलंका 254 रन ही बना सका. उपुल तरंगा और चमारा सिल्वा ने टीम के लिए अर्धशतक जड़े.

लगा कि भारत के पास मौक़ा बचा हुआ है. श्रीलंका को हराओ और सुपर-8 में पहुंचो. लेकिन, चमिंडा वास और मुथैया मुरलीधरन ने भारतीय बल्लेबाज़ों को बांधकर रख दिया और पूरी टीम 185 रन बनाकर आउट हो गई. सिर्फ़ कप्तान राहुल द्रविड़ अर्धशतक बना सके. यहां भी भारत को आख़िरी उम्मीद बची हुई थी. ग्रुप के आख़िरी मैच में बांग्लादेश और बरमूडा को भिड़ना था. अगर बरमूडा बांग्लादेश को हरा देता तो भारत सुपर-8 में पहुंच जाता, लेकिन बारिश से प्रभावित 21 ओवरों के मैच में बरमूडा ने बांग्लादेश को 95 रनों का टारगेट दिया, जिसे 7 विकेट से बांग्लादेश ने जीत लिया. भारत बाहर हो चुका था. श्रीलंका और बांग्लादेश सुपर-8 में पहुंच चुके थे.

इसके बाद 2011 और 2015 में भी भारत और बांग्लदेश की टीमें एक-दूसरे से भिड़ीं. इन दोनों मुक़ाबलों में भारत ने बाज़ी मारी. 2007 की हार से ग़ुस्साई भारतीय टीम ने 2011 में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ पहली पारी में 370 रन जड़ दिए. सहवाग ने उस दिन 175 रनों की विस्फ़ोटक पारी खेली थी. विराट कोहली ने भी उस मैच में चौथे नंबर पर बैटिंग करते हुए 100 रनों की नाबाद पारी खेली थी. भारत 87 रनों से मैच जीत गया.

2015 में दोनों टीम क्वार्टर फाइनल में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ थीं. मेलबॉर्न में उस दिन रोहित शर्मा का बल्ला चला और उनके 137 रनों की पारी की बदौलत भारत ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 302 रन बनाए और फिर बांग्लादेश को 193 पर समेटकर मैच 109 रनों से जीत लिया. हालांकि पिछले तीनों मुक़ाबलों की तुलना में इस वक़्त बांग्लादेश की टीम कहीं ज़्यादा लय में खेल रही है. लिहाज़ा बर्मिंघम में उतरने से पहले भारतीय टीम में ज़ेहन में 2007 की हार की यादें छंटी नहीं होंगी.

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