धोनी और मैरी कॉम

Navbharat Times

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Author 2019-09-28 14:35:00

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भारत में सबसे लोकप्रिय पुरुषों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी का नंबर है, जबकि महिलाओं में टॉप पर बॉक्सर मैरी कॉम हैं। सर्वे एजेंसी यूगॉव के एक सर्वेक्षण से यह खुलासा हुआ है। नरेंद्र मोदी तो पिछले कई सालों से पॉप्युलैरिटी में सबसे आगे चल रहे हैं। लेकिन धोनी और मैरी कॉम की लोकप्रियता का ग्राफ थोड़ा चौंकाता है। धोनी ऐसे समय टॉप पर हैं, जबकि खेल के मैदान में उनका पहले वाला जलवा नहीं दिखाई दे रहा और उनकी रिटायरमेंट की चर्चा तेज है। लेकिन वे धुआंधार बैटिंग कर रहे विराट से ज्यादा लोकप्रिय हैं यहां तक कि सदाबहार सचिन तेंडुलकर से भी। उसी तरह महिलाओं में मैरी कॉम दीपिका पादुकोण जैसी अभिनेत्री से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं।

क्या धोनी और मैरी कॉम का यह मुकाम सामान्य जन के नजरिए के बारे में कुछ कहता है? धोनी और मैरी कॉम में एक समानता है। दोनों रियल लाइफ हीरो हैं। दोनों साधारण परिवारों से आने वाले लोग हैं, जिन्होंने अपने संघर्ष के बल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई। धोनी उस मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने पिछले कुछ वर्षों में भारत के सामाजिक जीवन में एक नई पहचान कायम की है। धोनी के व्यक्तित्व में देश के छोटे शहरों का यही मध्यवर्ग अपनी छवि देखता है। यह बात मिडल क्लास को लुभाती है कि एक अत्यंत साधारण परिवार का उन्हीं के बीच का लड़का अभावों में रहकर भी शीर्ष पर पहुंच चुका है। वह एक तरफ विज्ञापनों में बेधड़क भोजपुरी में 'कइसन बा' बोलता है तो दूसरी ओर फर्राटेदार अंग्रेजी में अपनी राय रखता है। जब विज्ञापन और मॉडलिंग में धोनी की अकूत कमाई की खबर आती है तो मध्यवर्ग का अहं तुष्ट होता है।

यही बात मैरी कॉम पर भी लागू होती है। हमारे पुरुषवादी समाज में एक लड़की का बॉक्सिंग जैसे क्षेत्र में आना ही एक बड़ी घटना है। एक किसान की बेटी के स्टार बनने की सक्सेस स्टोरी न सिर्फ देश की असंख्य लड़कियों को बल्कि पूरे ग्रामीण-कस्बाई समाज को प्रेरित करती है। संयोग से धोनी और मैरी कॉम, दोनों के जीवन पर फिल्म बनी है और उनके जीवन संघर्ष को देश भर ने देखा है। लोगों ने देखा कि किस तरह मैरी कॉम को सिर्फ लड़की होने के कारण कई प्रशिक्षकों ने प्रशिक्षण देने से इनकार कर दिया। लेकिन मैरी की जिद के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा। दरअसल हाल के सामाजिक-आर्थिक विकास ने समाज के हर वर्ग में आगे आने की जबर्दस्त आकांक्षा पैदा की है। अब यह धारणा खत्म हो गई है कि समर्थ लोग ही हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए अब नायकत्व भी बदल रहा है। अब चोहरे-मोहरे और सौंदर्य के बजाय संघर्षपूर्ण व्यक्तित्व को पसंद किया जा रहा है। असल नायक वह है, जो कमजोर बैकग्राउंड से आकर मुख्यधारा में अपनी जगह बनाता है।

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