धोनी के ग्लव्स पर ICC का फैसला देश का अपमान नहीं है

Asiaville

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Author 2019-09-17 15:30:08

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“धोनी इंग्लैंड में क्रिकेट खेलने गए हैं, महाभारत करने के लिए नहीं. भारतीय मीडिया में क्या बेहूदा डिबेट चल रहा है? भारतीय मीडिया का एक तबक़ा युद्ध के लिए कुछ ज़्यादा ही उतावला है. उन्हें सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान या रवांडा में किराए के सैनिक बनाकर भेज देना चाहिए.”

ये बयान किसने दिया है इसे एक पल के लिए भूल जाइए. लेकिन, जिस तरह धोनी के ग्लव्स को भारतीय मीडिया ने पूरे देश की इज़्ज़त का सवाल बनाकर पेश किया, उस लिहाज़ से ये बयान बिल्कुल वाज़िब लगता है. धोनी सेना के जवान नहीं हैं. उन्होंने कोई सैन्य प्रशिक्षण नहीं लिया है. उन्हें मानद लेफ़्टिनेंट कर्नल का दर्जा मिला है. अगर वो सेना के जवान होते और प्रशिक्षित होते, तो भी क्रिकेट के मैदान में उनकी भूमिका वो नहीं होती.

खेल में एकता ज़रूरी है. देश के लिए खेलने का भाव भी ज़रूरी है. प्रतियोगी टीम से बढ़त लेने की होड़ भी ज़रूरी है, लेकिन सैन्य उन्माद खेल भावना नहीं है. खिलाड़ी की भूमिका सेना की भूमिका से उसी तरह अलग है, जैसे सेना का कोई जवान बंदूक़ लेकर दुश्मनों के ठिकाने पर सन्नी देओल की तरह बढ़ने लगे. सेना बॉलीवुड नहीं है और क्रिकेट सेना नहीं है. ग्लव्स पर सैन्य प्रतीकों को छपवाना राष्ट्रवाद नहीं है. सेना ख़ुद में राष्ट्र का पर्याय नहीं है. एक बार की बात है इंग्लैंड के ऑलराउंडर मोइन अली हाथ में बैंड पहनकर मैदान में उतर गए. बैंड पर लिखा था: सेव ग़ाज़ा, फ्री फ़लस्तीन. मैच रेफ़री ने तत्काल बैंड उतारने को कहा.

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इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी से अपील की कि मोइन अली का बैंड राजनीतिक ना होकर मानवता के पक्ष में है, लेकिन दलील नामंजूर हुई और अली को वो बैंड हटाना पड़ा. मैदान में उतरने के बाद राजनीति, धार्मिक और नस्लीय संदेश को ड्रेस में जगह नहीं दी जा सकती. कोई स्लोगन नहीं लिखवाया जा सकता. ये आईसीसी के ऊपर है कि वो इन मामलों में अंतिम फ़ैसला क्या लेताी है. मसलन भारत ने धोनी के ग्लव्स पर आईसीसी की आपत्तियों पर अपनी दलील पेश की और कहा कि ये राजनीतिक नहीं है. आईसीसी ने दलील नामंजूर कर दी. बीसीसीआई अब मान चुकी है, मीडिया नहीं मान रहा है. धोनी मान चुके हैं, सोशल मीडिया नहीं मान रहा है.

खिलाड़ी का काम खेलना है, मैदान में देश की सेना का ब्रैंड एंबैसेडर बनना नहीं. पुलवामा हमले के बाद भारतीय क्रिकेट टीम सेना की टोपी में मैच खेलने रांची में उतर गई थी. बीसीसीआई ने कहा था कि भारतीय क्रिकेट टीम ने पुलवामा में मारे गए अर्धसैनिक जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रतीक के तौर पर ये टोपी पहनी.

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लेख के शुरू में जो बयान उद्धृत किया गया है वो है पाकिस्तान के विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्री फ़वाद चौधरी का. वो रांची के मैच के वक़्त वहां के सूचना प्रसारण मंत्री थे. उस वक़्त भी पाकिस्तान ने भारतीय टीम की आईसीसी से शिकायत की थी. बात आई गई, हो गई.

लेकिन, प्रतीक चिह्नों को इस्तेमाल करने की रवायत उसके बाद भी बनी रही. नियमों के मुताबिक़ इस मामले में आईसीसी से इजाज़त लेनी चाहिए थी. धोनी और बीसीसीआई ने वो नहीं किया. जब आईसीसी ने आपत्ति जताई तो भारतीय टीवी मीडिया आईसीसी पर ही टूट पड़ा. एक अंग्रेज़ी अख़बार ने ऑल लाइन पोल किया जिसमें ज़्यादातर लोगों ने धोनी को विश्वकप छोड़कर वापस लौट आने की सलाह दी.

किसी क्रिकेट टीम के लिए विश्वकप जीतना बड़ी देशभक्ति होगी या ग्लव्स पर लगे नियम के बाहर के बलिदान बैच को हटाना बड़ी देशभक्ति होगी? खिलाड़ी की असली ताक़त उस खेल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है. उससे बड़ी ताक़त उसकी और कोई नहीं हो सकती. रांची में सेना की टोपी के साथ टीम उतरी थी और ऑस्ट्रेलिया से हार गई. अगर इस दलील के हिसाब से देखें तो फिर ये ना सिर्फ़ भारतीय क्रिकेट टीम की हार मानी जाएगी, बल्कि भारतीय सेना की भी हार के तौर पर इसे देखा जा सकता है.

एक दलील ये भी दी जाती है कि समाज का नायक होने के नाते खिलाड़ियों को राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहना चाहिए. निश्चित तौर पर एक नागरिक के बतौर हर जागरूक व्यक्ति से ये उम्मीद की जानी चाहिए. मैदान के बाहर अगर कोई खिलाड़ी ऐसा करता है और उसमें दुनिया का कोई क्रिकेट बोर्ड हस्तक्षेप करता है ये नागरिक अधिकार हनन का मामला होगा. लेकिन, किसी खेल या टूर्नामेंट की एक व्यवस्था होती है, नियम होते हैं, मैदान में उतरने के बाद उन नियम-क़ायदों को मानना उस खिलाड़ी के लिए इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वो उन नियमों से बंधकर खेलने की मंज़ूरी पहले से दे चुका होता है.

चाहे धोनी का मामला हो या फिर मोइन अली का, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इसे उग्र सैन्य राष्ट्रवाद की तरह संबोधित नहीं किया जा सकता. धोनी को बैज हटाने के निर्देश को समूचे देश के अपमान के तौर पर नहीं देखा जा सकता. चूंकि क्रिकेट में बीसीसीआई अभी दुनिया का सबसे शक्तिशाली क्लब है और क्रिकेट को लेकर भारतीय भी सबसे ज़्यादा जुनूनी है इसलिए क्रिकेट पर मोल-तोल और धौंसपट्टी दिखने को मिल रही है, वरना एथलेटिक्स का मामला होता तो चीख़-पुकार करने वालों को कानों-कान ख़बर तक नहीं होती.

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