पिता के त्याग से आत्मबोध, बदल गया जीवन

Nai Dunia

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Author 2019-09-21 06:40:22

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सर पे आसमान की छत की तरह पिता होते हैं और पांव पे जमीन की तरह मां। मेरे सिर से आसमान का साया उठे 8 बरस हो चले हैं, लेकिन यादों की बदली आज भी ऐसी घुमड़-घुमड़ के आती है कि जाने का नाम नहीं लेती है। मैं 1986 भोपाल में पीईटी की कोचिंग के लिए किराए का रूम लेकर रह रहा था। पिताजी (हरिकृष्ण मालवीय) वहां मुझसे मिलने आए थे। सब इंतजाम करने और पर्याप्त खर्चा देने के बाद भी स्टेशन जाते वक्त मेरी आंखों में झांक कर वे अनायास ही पूछ बैठे कि और पैसे तो नहीं चाहिए? मेरी मौन स्वीकृति पर उन्होंने 100 रुपए का नोट दिया। उस दौर में आवारगी चरम सीमा पे थी, ना समय की महत्ता पता थी ना कल की चिंता थी। उनके बार-बार पूछे जाने पर पेपर अच्छे जाने का झूठ और चयन होने का विश्वास उन्हें बिना आंख मिलाए दिलाया करता था। चयन नहीं होना है, यह तो मुझे पहले से पता था, लेकिन चश्मा बदल-बदल कर उनका मेरा रोल नंबर ढूंढना और नहीं मिलने पर उनकी व्यथा आज स्वयं पिता होने के बाद वेदना बन रगों में दौड़ती है। किसी अवसर पर उन्होंने राज खोला था कि उन्होंने भोपाल से लौटते समय मुझे जो 100 रुपए अतिरिक्त दिए थे, उसके बाद उनके पास मात्र 10 रुपए बचे थे और वे जोखिम उठा कर मात्र प्लेटफॉर्म टिकिट पर भोपाल से बैतूल आए थे। यही राज मेरे जीवन का पहला आत्म-बोध था। यह जान कर मेरे मन में भूचाल आया था और मैंने उसी पल जीवन की एक नई राह चुनी। आत्मबल, आत्मसंयम और अपने अंदर के अच्छे इंसान को तलाशते-तराशते आज जीवन पथ पर चलते हुए मेरे उन्हीं पिता के आशीर्वाद, त्याग और सबक से एक सफल वकील बन पाया हूं। आज वे नहीं हैं, लेकिन वे मेरे कण- कण में हैं और सदैव रहेंगे।

- नवनीत मालवीय, अधिवक्ता, बैतूल।

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