पिता को देख शगुन बनी शूटर

Patrika

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Author 2019-09-16 23:23:47

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जयपुर। पिता ने सफलता के जो निशां छोड़े, बेटियों ने उन पर चल नए आयाम स्थापित किए हैं। उन आयामों में बेटा और बेटी का फर्क मिट जाता है। पिता और बेटी जब एक साथ अपनी सफलता का जश्न मनाते हैं तो समाज के उस तबके के लिए एक सीख है, जो बेटियों के अपने वजूद को नकारता रहा है। 22 सितंबर को एक बार फिर हम डॉटर्स डे मनाने जा रहे हैं। इसी मौके पर आपको रूबरू करवाते हैं, उन्हीं बेटियों से जिन्होंने पिता से चलना सीखा और आज सफलता की दौड़ में आगे हैं...

2 साल की शगुन के हाथ में गन
देशभर में ऐसी कई बेटियां हैं, जो अपने पिता के नक्शेकदम पर चली और आज पिता से एक कदम आगे हैं। पिता भी इस बात पर खुश हैं कि बेटी ने वो उपलब्धि हासिल की, जो वो चाहते थे। ऐसे ही पिता हैं नेशनल शूटर सुशील चौधरी। अपने पिता की हाथ में शॉटगन देख बड़ी हुई शगुन चौधरी आज देश की बेस्ट वीमन शूटर हैं। और देश ही नहीं इंटरनेशनल शूटर्स में वे जाना पहचाना नाम हैं। शगुन कहती हैं कि वो बाय बोर्न शूटर हैं, वो इसलिए कि वो सिर्फ दो साल की थी, तब ही उनके पिता ने उनके हाथ में गन पकड़ा दी थी। जिस उम्र में पिता बेटी के लिए गुड़िया लाते हैं, तब सुशील चौधरी ने दो साल की बेटी को स्कीट शूटिंग में एक प्रतिभागी के तौर पर तैयार कर दिया था। इससे पहले शगुन अपनी टॉय गन से पिता सुशील के साथ शूटिंग रेंज जाती थी। जहां से उसने टारगेट के बारे में जाना। आपको बता दें कि स्कीट शूटिंग एक मनोरंजक गेम होता है, जिसमें मिट्टी के टारगेट को ढहाया जाता है। बस वहीं से शगुन चौधरी ने उसे दीवार का ढहा दिया, जो किसी भी बेटी के सपनों में रुकावट होती है।

ओलम्पिक के लिए किया था क्वालिफाई
शगुन चौधरी देश की ऐसी पहली महिला शूटर हैं, जिसने 2012 में ओलम्पिक ट्रेप शूटिंग को क्वालिफाई किया और दिखा दिया कि हर खेल में बेटियां बाजी मार सकती हैं। इससे पहले देश में शूटिंग ऐसा ही खेल रहा है, जिसमें पुरुष वर्चस्व ही रहा। महिलाओं के लिए यह मुश्किल गेम माना जाता, जिसे अपने हौसले के साथ शगुन ने आसान कर दिखाया। अब वो ओएनजीसी की ओर से खेलती हैं। शगुन का मानना है कि लक्ष्य हमेशा उंचा होना चाहिए, ताकि नजरें उपर ही रहे और कदम उन नजरों के इशारों पर चलते रहे। हर रुकावट को छोटा करते हुए, हर मुश्किल का पार कर, बस वहां तक पहुंचने का जुनून रहे, जहां आपका लक्ष्य है। वो कहती हैं कि शॉटगन शूटिंग आसान नहीं है, गन इतनी भारी होती है कि आपके कंधे और हाथ उम्मीद से कई ज्यादा मजबूत होने चाहिए और उससे भी मजबूत हौसला। और यह हौसला उन्हें पिता सुशील चौधरी से मिला। उन्होंने बचपन से यही जाना कि पापा जब शॉटगन उठा सकते हैं तो वो भी उठा सकती है। उन्हें कभी यह नहीं जताया या सिखाया गया कि महिलाएं इस काम के लिए किसी तरह कमजोर होती हैं। इसीलिए वे अपने शूटिंग कॅरियर को लेकर आशावादी हैं।

डबल ट्रैप से ट्रैप पर
1983 में जयपुर में जन्मी शगुन ने 2017 में 61वीं नेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप में वीमन ट्रैप इवेंट अपने नाम किया। आपको बता दे कि पहले वे डबल ट्रैप की शूटर रही, लेकिन ओलम्पिक से डबल ट्रैप शूटिंग हटाने और ट्रैप को शामिल करने के बाद वे भी ट्रैप शूटिंग की ट्रेनिंग लेने लगी हैं, जो डबल ट्रैप से मुश्किल होती है। लेकिन शगुन के लिए उनका पहला प्यार शूटिंग ही है। यह प्यार और यह सपना उन्हें पिता ने दिया, जब उन्हें खिलौने वाली बंदूक खेलने के लिए दी गई।

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