बेदी को धीमे बाएं-हाथ के गेंदबाजी में महारत हासिल थी

Hindustan Khabar

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Author 2019-09-25 11:41:56

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1970 के दशक में स्पिन गेंदबाजी की प्रसिद्ध 'चौकड़ी' (बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर, राघवन) का हिस्सा रहे बिशन सिंह बेदी आज (बुधवार) 73 साल के हो गए. उनका जन्म 25 सितंबर 1946 को अमृतसर में हुआ था. उन्होंने 67 टेस्ट मैचों में 266 विकेट चटकाए. वह 22 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम के कप्तान भी रहे. उन्होंने 1560 विकेटों के साथ अपना प्रथम श्रेणी क्रिकेट करियर खत्म किया.

बिशन सिंह बेदी के क्रिकेट करियर से जुड़ा एक वाकया आज भी याद किया जाता है. 1978 में नापाक पाकिस्तानी इरादे से खफा भारतीय टीम के कप्तान बेदी ने जीत की ओर बढ़ रहे अपने बल्लेबाजों को मैदान से वापस बुला लिया था. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में यह पहला उदाहरण था, जब किसी कप्तान ने बईमानी पर उतर आई विरोधी टीम को गुस्से में जीत दे दी हो. वनडे मुकाबले में उस वक्त भारत को जीत के लिए 14 गेंदों में 23 रन चाहिए थे और उसके 8 विकेट सुरक्षित थे.

3 नवंबर 1978 को पाकिस्तान के शाहीवाल के जफर अली स्टेडियम में भारत-पाक सीरीज का तीसरा और निर्णायक मैच खेला गया था. अंपायरिंग की जिम्मेदारी जावेद अख्तर और खिजर हयात पर थी. यानी पाकिस्तान के 11 खिलाड़ियों के अलावा दोनों अंपायर भी उनके अपने ही थे.

40 ओवरों के मैच में पहले बल्लेबाजी करने उतरे पाकिस्तान को भारतीय गेंदबाजों ने 205/7 के स्कोर पर रोक दिया था. सुनील गावस्कर की गैरमौजूदगी में चेतन चौहान और अंशुमन गायकवाड़ ने भारत की जवाबी पारी का आगाज किया. दोनों ने बड़े आराम से 44 रन जोड़ लिये. चौहान (23 रन) का विकेट गिरने के बाद उतरे सुरिंदर अमरनाथ (62 रन) ने गायकवाड़ के साथ स्कोर को 163 तक पहुंचा दिया. जीत का लक्ष्य आसान हो चुका था.

गायकवाड़ के साथ गुंडप्पा विश्वनाथ क्रीज पर थे. 38वां ओवर शुरू हुआ और जीत के लिए भारत को महज 23 रनों की जरूरत थी. पाकिस्तान के कप्तान मुश्ताक मोहम्मद परेशान थे. सरफराज नवाज गेंदबाजी करने आए. और इसके बाद जो भी हुआ वह पाकिस्तानी क्रिकेट को बदनाम कर गया.

सरफराज नवाज ने उस ओवर में लगातार चार बाउंसर फेंके, लेकिन अंपायर ने उनमें से एक को भी वाइड नहीं दिया. पाकिस्तान का प्लान था, निगाहें जमा चुके गायकवाड़ से इतनी दूर गेंद फेंको कि वह मार ही न पाए और उनकी इस स्कीम में पाकिस्तानी अंपायर उनके साथ थे. उन दिनों न्यूट्रल अंपायर का दौर शुरू नहीं हुआ था.

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