हार के बाद नहीं रूकनेवाला असली चैंपियन : गोपीचंद

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Author 2019-09-26 04:15:29

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केवल मेहनत करने से आप जीवन में सफल नहीं हो सकते हैं, बल्कि इसके लिए मेहनत में निरंतरता का होना जरूरी है। सफलता की डगर पर कभी रोमांचक पल, तो कभी अनगिनत उबाऊ पल का सामना करना पड़ेगा, लेकिन अपने जीवन में सफल वही होता है, जो इन सब चीजों को सहजतापूर्वक पार कर लेता है।

उक्त बातें ऑल इंग्लैंड चैंपियन बैंडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद ने बुधवार की शाम लोयोला स्कूल के फेजी ऑडिटोरियम में सर दोराबजी टाटा जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यान ‘सेलिब्रेशन ऑफ स्पोटर्स में अपना अनुभव साझा करते हुए कही।

जाने-माने खेल विशलेषक बोरिया मजूदमदार के सवालों का जवाब देते हुए गोपीचंद ने कहा कि ऐसा नहीं है कि चैंपियन खिलाड़ी कभी हारता नहीं है, लेकिन असली चैंपियन वही होता है, जो हारने के बाद भी रूकता नहीं है। कहने का मतलब यह है कि बाधाओं को अवसर में तब्दील करनेवाला ही अपने लक्ष्य को हासिल कर सकता है।

क्रिकेट की भीड़ ने बैडमिंटन में ला दिया

गोपीचंद ने कहा कि 1983 में जब भारतीय क्रिकेट टीम विश्व विजेता बनी, तो देशभर के युवाओं में क्रिकेटर बनने का जुनून सवार हो गया और कुछ समय के लिए मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा बन गया।

लेकिन क्रिकेट सीखने के लिए एकेडमी का रूख किया, तो वहां की भीड़ देख मेरी हिम्मत टूट गई। इसके बाद टेनिस एकेडमी की ओर बढ़ा, तो वहां खिलाड़ियों के साथ-साथ चार पहिया वाहनों की कतार देख में असहज हो गया। मुझे अहसास हुआ कि मुझ जैसे साधारण परिवार के युवक के लिए यह खेल भी सही नहीं है। इसके बाद मैंने बैडमिंटन की ओर रुख किया, जहां अपेक्षाकृत कम भीड़ मिली और मैं हमेशा के लिए बैडमिंटन का होकर रह गया।

चिल्लाकर पढ़ने से मिलता था खेलने की इजाजत

गोपीचंद कहते हैं कि उन पर पढ़ाई को लेकर काफी दबाव था, क्योंकि उनके बड़े भाई राजशेकर आइआइटी में थे। बैंककर्मी पिता पुलेला सुभाष चंद अक्सर ट्रांसफर होने की वजह से कभी ओडिशा तो कभी चेन्नई में रहते थे, ऐसे में मां सुब्बारम्मा ही उनकी हर जरूरतों को पूरा करती थी।

अपनी मां से गोपीचंद को खेलने की तभी इजाजत मिलती थी, जब वे प्रतिदिन सुबह में एक घंटे तक चिल्ला-चिल्लाकर पढ़ा करते थे।

इंज्यूरी ने भी गोपीचंद को खूब परेशान किया

गोपीचंद ने कहा कि वे वर्ष 1994, 1996 और 1998 को कभी याद नहीं करना चाहेंगे, क्योंकि ये वो साल हैं, जिसने उनके करियर पर ग्रहण लगा दिया था। दरअसल इन सालों में गोपीचंद को इंज्यूरी से जूझना पड़ा था। उनके दोनों घुटने की सर्जरी हुई थी। जिसके कारण वे कई प्रतियोगिताओं से बाहर हो गए थे।

ऑल इंग्लैंड खिताब से स्टार बने गोपीचंद

वर्ष 2002 गोपीचंद के करियर का सबसे मूल्यवान साल रहा, क्योंकि इसी वर्ष उन्होंने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप का खिताब जीता था। गोपीचंद ने कहा कि ऑल इंग्लैंड चैंपियन बनने के बाद तो सबकुछ बदल गया, क्योंकि अब बैडमिंटन की दुनिया में पुलेला गोपीचंद एक बड़ा नाम बन चुका था।

साइन व सिंधू ने भारतीय बैडमिंटन को ऊंचाई प्रदान की

गोपीचंद ने कहा कि साइना नेहवाल और पीवी सिंधू यह वो नाम है, जिसने भारतीय बैडमिंटन को ऊंचाई की है।

उन्होंने कहा कि साइना को डांटकर बैडमिंटन सिखाया, तो सिंधु को कड़े अनुशासन के बीच। लेकिन दोनों ही खिलाड़ियों की खासियत यह थी कि उनमें सीखने की ललक थी और यही कारण है कि आज ये दोनों ही खिलाड़ी भारतीय बैडमिंटन के शीर्ष पर विराजमान हैं।

फाइनल में मिली हार से निराश हो गई थी सिंधू

2016 रियो ओलंपिक के फाइनल में हारने के बाद सिंधू ने मुझसे कहा, सर मैं हार गई। इस पर मेरा जवाब था, तुम हारी नहीं हो, बल्कि ओलंपिक रजत पदक विजेता खिलाड़ी हो। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।

गोपीचंद ने कहा कि जब सिंधू सेमीफाइनल मैच जीतकर होटल पहुंची थी, तब हमने जश्न मनाने के बजाय फिर से अभ्यास शुरू कर दिया था। वहां हमने तौलिया का नेट बनाया था, जिसके माध्यम से सिंधू ने लगभग एक घंटे तक अभ्यास किया था।

खिलाड़ी ही असली चैंपियन होता है

व्याख्यान के अंत में गोपीचंद ने कहा कि खिलाड़ी ही असली चैंपियन होता है, क्योंकि एक खिलाड़ी कभी हारता नहीं है। वह या तो जीतता है या फिर सीखता है। इसलिए हर किसी को अपने जीवन में खेल को महत्व देना चाहिए।

कार्यक्रम में उपस्थित लोग

सर दोराबजी टाटा व्याख्यान में टाटा स्टील कॉरपोरेट सर्विसेज के उपाध्यक्ष चाणक्य चौधरी, चीफ कुलविन सुरीन, टाटा स्टील खेल विभाग व एवियेशन चीफ रवि राधाकृष्णन, जेएफसी की सीईओ मुकुल विनायक चौधरी, खेल विभाग के हेड आशीष कुमार एवं द्रोणाचार्य तीरंदाजी कोच पूर्णिमा महतो समेत टाटा स्टील द्वारा संचालित विभिन्न एकेडमी व ट्रेनिंग सेंटर के प्रशिक्षु व स्कूली बच्चे मौजूद थे। कार्यक्रम के अंत में स्कूली बच्चों ने गोपीचंद से कई सवाल भी किए।

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